‘काला’ फिल्म नहीं, एक राजनीतिक कमेंट्री है…

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नई दिल्ली: हमारे एक वामपंथी मित्र थे. एक बार हमलोग बारिश के महीने में दरभंगा टावर पर खड़े थे. बारिश थोड़ी सी होते ही दरभंगा का हाल वेनिस वाला होता है, बस पानी नालों का कालापन लिए, सैकड़ों पॉलीथीन और कचरे से लैस होता है. वहीं किसी भी छोटे कस्बे का सा हाल था. दो-तीन दिनों पहले ही नए आए एसपी ने वहां अतिक्रमण-विरोधी अभियान चलाकर टावर को खाली करवाया था, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. मैंने अपने मित्र को वह दिखाते हुए दो-तीन मोटी गालियां लोगों के सिविक सेंस को दी और कहा कि शहरों का कचरा तब तक नहीं हट सकता, जब तक यहां के लोग नहीं सुधरेंगे. जैसी कि उम्मीद थी, वामपंथी मित्र ने मुझे अर्थशास्त्र और नागरिकशास्त्र का पाठ देना शुरू किया. उनके मुताबिक यह लोगों की गरीबी है, जो अतिक्रमण का कारण है, ‘तुम ही सोचो न यार, ये लोग अगर ठेला नहीं लगाएंगे, तो जिएंगे कैसे?’ उनकी 15 मिनट की क्लास के बाद मैं हंस दिया. उनको कोई जवाब नहीं दिया. जवाब क्यों नहीं दिया, यह आगे बताऊंगा.

फिल्म ‘काला’ की जबर्दस्त चर्चा है. ‘काला’ में वह सबकुछ है, जो आज के राजनीतिक माहौल में एक शानदार टिप्पणी के तौर पर दर्ज होना चाहिए, हालांकि फिल्म है तो इसकी फिसलन भी है, रपटन भी है और कुछेक बेहद खतरनाक सामान्यीकरण भी हैं. दक्षिण भारत फिल्मों के मामले में मुंबइया जोकरों से बहुत अधिक समृद्ध है. वहां सामयिक विषयों से लेकर खांटी राजनीतिक फिल्में बनती हैं. उनको पता है कि कैसा नैरेटिव सेट करना है? ‘काला’ में सबकुछ है. सरलीकरण है, लेकिन बिल्कुल छिपा हुआ- तीरे नीमकश की तरह. नैरेटिव हैं, लेकिन चाशनी में लपेटी हुई. बेहद सपाटबयानी है, लेकिन कहानी में गुंथी हुई.

यहां अंबेडकर और नीले झंडे भी हैं, महान राष्ट्रवादी पार्टी (ध्यान दीजिएगा) भी है, अमेरिका के काले लोगों की तर्ज पर ही यहां के लड़कों का चित्रण भी है और खलनायक के तौर पर हरिभाई (फिर से नाम पर ध्यान दीजिएगा) भी हैं. एनजीओ भी है, गंगा-जमनी तहजीब के तौर पर जिसकी पैरोकार भी है. तो, कुल मिलाकर तीन धाराएं हैं- काला का मिलिटैंट दलितवाद, उसके एक बेटे का मध्यमार्गी एनजीओवाद भी है.(आजकल गनही महतमा को एनजीओ से रिप्लेस कर दिया गया है) और मनुवादी, ब्राह्मणवादी, हिंदुत्व तो है ही जो खल है, बुरा है, दुष्ट है, जिसके निग्रह के लिए भीम-मीम गठजोड़ है.हालांकि, जिस तरह एनजीओ गलतबयानी करते हैं, वह भी इस फिल्म में है.

जब अफ्रीका के स्लम्स में काम कर वापस धारावी लौटी बाई यह बताने लगती है कि रियो ओलंपिक्स के पहले वहां स्लम्स को कैसे सुधारा गया. हालांकि, वह भूल जाती है कि स्लम्स को जब वहां बाकायदा ब्रूट-फोर्स से हटाया गया, तो उसका कोई हिसाब-किताब नहीं किया गया, खैर..फिल्में हैं और इतना चलता है. फिल्म के दो-तीन दृश्य बहुत मानीखेज हैं. काला के यहां हरि का पानी भी न पीना, हरि के सफेद कपड़े या फिर काला का हमेशा ही काले कपड़े पहने रहना. या फिर काला का हरि की पोती को केवल नमस्ते करने के लिए बोलना. हरि का पांव छूने के लिए पैर बढ़ाना. एक हीरो की तरह हरि के ‘हेंचमैन’ को काला द्वारा मार दिया जाना. निर्देशक को यह पता है कि उसे कहानी को किस दिशा में और कहां ले जाना है? यह फिल्म रजनीकांत की पिछली फिल्म कबाली से कहीं भी कम व्यावसायिक नहीं है, लेकिन इस फिल्म के राजनीतिक अंडरटोन और ओवरटोन इतने सघन हैं कि वह किसी को भी बेहद आसानी से समझ में आ सकते हैं.

फिल्म में नायक रजनीकांत नमाज पढ़ते हैं, पूरी फिल्म में कई जगह बैकग्राउंड में बुद्ध और अंबेडकर अपनी पूरी आभा में मौजूद हैं. यहां तक कि फिल्म के अंतिम दृश्य में सब कुछ नीला-नीला ही हो जाता है. ज़रा नायक का नाम देखिए, काला. उसके एक बेटे का नाम लेनिन है, तो उसकी गर्लफ्रेंड का तूफानी. उसके युवावस्था का प्यार एक मुसलमान लड़की है. यहां तक कि उस मुसलमान की बेटी का नाम काइरा है, जो ग्रीक में काले का अर्थ देता है. काला नाम भी दरअसल काला भगवान का प्रतीक है (यहां निर्देशक ने साफ कर दिया है कि वह मूलनिवासियों के देवता हैं). फिल्म के पहले फ्रेम से लेकर आखिरी फ्रेम तक यह निर्देशक की फिल्म है और यह रंजीत की कुशलता है कि वह रजनी अन्ना जैसे महानायक को भी नकेल डाल सके हैं, अपनी कहानी से. फिल्म आहिस्ता से कई तरफ इशारा करती है, जैसे खलनायक नाना पाटेकर में लोग चाहें तो बाल ठाकरे को देख सकते हैं, जिन्होंने लुंगीवालों (दक्षिण भारतीय) को भगाने की शुरुआत की थी, जो गरजकर कहता है कि बांबे उसका था, बंबई भी उसी का रहा और मुंबई उसी की होगी (य़ह मराठी में कहता है). उत्तर-दक्षिण के साथ ही आर्य-द्रविड़ विवाद को भी साफ तौर पर फिल्म में छुआ गया है.

आखिरी दृश्य में जब मारपीट हो रही होती है और राम-रावण युद्ध का वर्णन बैकग्राउंड में चलता है, तो दर्शकों के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि रजनी और नाना में किसको राम कहा जा रहा है…अपने कर्मों से तो रजनीकांत राम हैं, लेकिन गोरे-काले के हिसाब से देखें तो नाना को राम होना चाहिए, जो वह हैं नहीं. फिल्म में स्वच्छता अभियान को निशाना बनाया गया है और नैरेटिव यह सेट किया गया है कि सफाई के नाम पर दरअसल गरीबों को उजाड़ा जा रहा है. यह बहुत पुरानी बहस है, और यहीं यह लेखक पहले पैरे में अपने वामपंथी मित्र के दिए गए ज्ञान पर हंसी की वजह बताएगा. ‘काला’ फिल्म मुंबई और उसमें भी धारावी की है. मुंबई में सबसे बड़ा स्लम और झोपड़पट्टी है. हालांकि, मुंबई में कई मित्रों ने मुझे बताया कि सरकार ने कई लोगों को झुग्गी की जगह जब फ्लैट बनाकर दिए, तो फ्लैट तो किराए पर लग गए, झुग्गियां जस की तस रहीं, या फिर कहीं औऱ चली गयीं. मैं अपने मुहल्ले में देख रहा हूं कि लोग प्रधानमंत्री शहरी मकान योजना के तहत मकान तो बनवा ही रहे हैं, फिर भी जहां सरकारी ज़मीन पर उन्होंने झुग्गियां बसायी हैं, उससे हट नहीं रहे. वही बात मुझे याद आयी, टावर के संदर्भ में, जहां हजारों की रोजाना बिक्री और फायदा करनेवाली दुकानों ने भी सड़क पर अतिक्रमण कर रखा है. उनकी गरीबी का क्या संदर्भ समझा जाए?

काला में सवाल बहुतेरे हैं, लेकिन सरलीकरण हद से अधिक है. यह फिल्म लगता है जैसे वर्तमान सरकार के विरोध में ही कमरे में बैठकर लिखी गयी है. रजनीकांत इस मामले में कमल हासन से बहुत आगे की चीज़ हैं कि एक तो उन्होंने अपने पत्ते नहीं खोले हैं, लेकिन उनकी फिल्मों के जरिए वह राजनीतिक संदेश लगातार देते रहते हैं. फिल्म को अगर आईना मानें तो रजनीकांत ने तय कर दिया है कि उनकी राजनीति किस ओर जाएगी. फिर भी, मुंबइया फिल्मों के कचरे से ऊबा आदमी इस फिल्म को महान और संपूर्ण कलावादी मानकर रजनी अन्ना के जाल में फंसेगा ही, इसमें कैसी दिक्कत?

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