बांग्लादेश में भगवान विष्णु की प्रतिमा बरामद,कीमत जानकर चौंक जाएंगे आप

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ढाका: उत्तरी बांग्लादेश में निकष पत्थर से बनी 70 किलोग्राम वजनी भगवान विष्णु की एक प्रतिमा बरामद की गई है जिसकी कीमत करोड़ों रूपये है. ढाका ट्रिब्यून ने आज अधिकारियों के हवाले से खबर दी है कि राजधानी से 203 किलोमीटर दूर नटोरे जिले के पश्चिम हाघुरिया गांव में एक घर से कल रात प्रतिमा बरामद की गयी.

एनडीसी अनिंद्या कुमार ने बताया कि एक खु्फिया सूचना के आधार पर नटोरे जिला प्रशासन की एक टीम ने घर पर छापामारी की. उन्होंने बताया कि प्रतिमा का वजन 70 किलोग्राम है और इसका मूल्य कई करोड़ बांग्लादेशी टका है. नटोरे की उपायुक्त शहीना खातून ने बताया कि प्रतिमा राजकोष को सौंप दी जाएगी.

भगवान विष्णु के रक्त से उत्पन्न हुई शिप्रा नदी
आपको बता दें कि एक किंवदंती के अनुसार शिप्रा नदी विष्णु जी के रक्त से उत्पन्न हुई थी. मोक्षदायनी नदी शिप्रा नदी का काफी पौराणिक महत्‍व है और यह मध्य प्रदेश की धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी उज्जैन से होकर गुजरती है. उज्जैन की शिप्रा नदी, जहां हर 12 वर्ष बाद सिंहस्थ कुंभ का आयोजन किया जाता है. कुंभ विश्व का सबसे बड़ा मेला है. ब्रह्मपुराण में भी शिप्रा नदी का उल्लेख मिलता है. संस्कृत के महाकवि कालिदास ने अपने काव्य ग्रंथ ‘मेघदूत’ में शिप्रा का प्रयोग किया है, जिसमें इसे अवंति राज्य की प्रधान नदी कहा गया है.

महाकाल की नगरी उज्जैन, शिप्रा के तट पर बसी है. स्कंद पुराण में शिप्रा नदी की महिमा लिखी है. पुराण के अनुसार यह नदी अपने उद्गम स्थल बहते हुए चंबल नदी से मिल जाती है. प्राचीन मान्यता है कि प्राचीन समय में इसके तेज बहाव के कारण ही इसका नाम शिप्रा प्रचलित हुआ. शिप्रा नदी का उद्गम स्थल मध्यप्रदेश के महू छावनी से लगभग 17 किलोमीटर दूर जानापाव की पहाडिय़ों से माना गया है. यह स्थान भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम का जन्म स्थान भी माना गया है. शिप्रा नदी की उत्तपत्ति के बारे में एक पौराणिक कथा का उल्लेख, हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है.

बहुत समय पहले भगवान शिव ने ब्रह्म कपाल लेकर, भगवान विष्णु से भिक्षा मांगने पहुंचे. तब भगवान विष्णु ने उन्हें अंगुली दिखाते हुए भिक्षा प्रदान की. इस अशिष्टता से भगवान भोलेनाथ नाराज हो गए और उन्होंने तुरंत अपने त्रिशूल से विष्णु जी की उस अंगुली पर प्रहार कर दिया. अंगुली से रक्त की धारा बह निकली. जो विष्णुलोक से धरती पर आ पहुंची. और इस तरह यह रक्त की यह धार, शिप्रा नदी में परिवर्तित हो गई. शिप्रा नदी के किनारे स्थित घाटों का भी पौराणिक महत्व है. जिनमें रामघाट मुख्य घाट माना जाता है.

कहते हैं भगवान श्रीराम ने पिता दशरथ का श्राद्धकर्म और तर्पण इसी घाट पर किया था. इसके अलावा नृसिंह घाट, गंगा घाट, पिशाचमोचन तीर्थ, गंधर्व तीर्थ भी प्रमुख घाट हैं. शिप्रा नदी के किनारे स्थित सांदीपनी आश्रम में भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और उनके प्रिय मित्र सुदामा ने विद्या अध्ययन किया था. हिंदू धर्मग्रंथों में वर्णित है कि राजा भर्तृहरि और गुरु गोरखनाथ ने भी इस पवित्र नदी के तट पर तपस्या से सिद्धि प्राप्त की. शिप्रा, गंगा, सरस्वती और नर्मदा आदि ऐसी अनेक नदियां हैं, जो पवित्र मानी जाती हैं. ये नदियां ना तो मैली होती हैं और ना ही इनका जल अशुद्ध होता है. उज्जैन में मां शिप्रा का काफी पौराणिक महत्व है.

 

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