52 सालों तक ‘अटल’ के साथ साए की तरह रहे थे जयपुर के शिवकुमार

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जयपुर: पूर्व प्रधानमंत्री और जननायक अटल बिहारी वाजपेयी अब हमारे बीच में नही हैं, लेकिन उनकी यादों से जुड़ा एक पूरा समंदर आज भी जयपुर में हिलोरे ले रहा है. जयपुर से वाजपेयी का एक खास रिश्ता रहा है वह भी पिछले पांच दशक से. पिछले 52 सालों से वाजपेयी साहब के साथ साए की तरह साथ रहने वाले उनके निजी सचिव शिवकुमार जयपुर के ही रहने वाले हैं. खास तौर पर पिछले 13 साल से जब अटल जी बिलकुल मौन थे तब केवल एक मात्र व्यक्ति शिवकुमार ही थे जिनके पास 24 घंटे वाजपेयी की देखभाल की जिम्मेदारी थी.

शिव कुमार को रखा था वाजपेयी की सुरक्षा में
दरअसल, अटल बिहारी वाजपेयी 1957 में पहली बार लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद पहुंचे थे. तब तक एक युवा नेता के तौर पर वाजपेयी की लोकप्रियता बढ़ चुकी थी. लोग उनके भाषण शैली के मुरीद हो चुके थे. उनके इर्द-गिर्द उनसे मिलने के लिए भीड़ जमा होने लगी थी. तब RSS के नेताओं को लगा था कि उनकी सुरक्षा का पुख्ता बंदोबस्त किया जाना चाहिए, इसलिए तलाश शुरू हुई एक ऐसे व्यक्ति की जो अटल बिहारी की सिक्योरिटी और उनकी देखभाल का जिम्मा संभाल सके. काफी तलाश के बाद नानाजी देशमुख ने जयपुर के शिवकुमार पारीक का नाम सुझाया. शिवकुमार आरएसएस के हार्डकोर स्वयंसेवक थे. अपने गठीले शरीर और रौबीली मूंछों के कारण वह औरों से अलग दिखते थे.

अटल से 1957 में जुड़े थे शिव कुमार 
1957 का साल था जब शिव कुमार पारीक को वाजपेयी के साथ जुड़ने का मौका मिला था. शिवकुमार केवल अटल बिहारी वाजपेयी के निजी सहायक के बतौर ही नहीं, बल्कि उनके हर राजनीतिक उतार-चढ़ाव के साक्षी रहे. उनकी अनुपस्थिति में सालों तक शिवकुमार ने ही लखनऊ संसदीय क्षेत्र को संभाला. बलरामपुर के अलावा वे हर चुनाव में उनके चुनाव एजेंट रहे और सुख-दुख के साथी. वाजपेयी के स्वस्थ रहने तक उनके हर पारिवारिक कार्यक्रम में वे शरीक हुए. शिवकुमार के पुत्र महेश पारीक बताते हैं कि पिताजी उस समय उच्च शिक्षित थे. BA, MA, LLB करने के बाद राजस्थान बैंक की नौकरी में थे. वाजपेयी के साथ रहने का बुलावा आने पर शिवकुमार ने नौकरी छोड़ी और बोरिया बिस्तर लेकर उनके पास चले गए.

खाने के शौकीन थे वाजपेयी
उन्होंने 1965 में वाजपेयी के निजी सहायक के तौर पर साथ शुरू किया जिसे आज तक निभा रहे हैं. महेश बताते है कि उनके पिता शिवकुमार मानते है कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निजी सहायक के तौर पर वाजपेयी के साथ बिताए पल अविस्मरणीय हैं. महेश कहते हैं कि वाजपेयी जयपुर में जब भी आते थे परिवार के साथ खाना खाते थे. मिठाइयों के शौकीन थे कहकर मिठाई मंगवाते थे. पिताजी को 2 दिन से ज्यादा नहीं छोड़ते थे. पिताजी जब जयपुर आते और दो से तीसरा दिन होता, तो मुझे फोन करते कहते महेश शिव को भिजवा दे मन नहीं लग रहा है. पिताजी का भी यही हाल था. दो दिन से ज्यादा वाजपेयी साहब से दूर नहीं रह सकते थे.

जयपुर का कलाकंद था वाजपेयी को पसंद
वाजपेयी को जयपुर का कलाकंद और घेवर काफी पसंद था. अक्सर त्यौहार पर ये दोनों मिठाईयां भेजी जाती थी. उनकी भगवान गणेश जी में गहरी आस्था थी. उन्हें खासतौर पर जयपुर से काफी लगाव था. अपने मित्रों और मेहमानों को देने के लिए खजाने वालों के रास्ते से उनके लिए छोटी गणेशजी की मूर्तियां भेजी जाती थी. जयपुर की रजाईयां भी उन्हें काफी पसंद थी. मित्रों को भेंट देने के लिए खासतौर पर चौड़ा रास्ता से ये रजाईयां उन्हें भेजी जाती थी.

हार को भी सेलिब्रेट करना आता था वाजपेयी को
शिवकुमार के पुत्र महेश कुमार को भी वाजपेयी के साथ 20 साल तक रहने का अवसर मिला है. वाजपेयी के साथ उनकी खास तरह की याद रही है. उनका विशेष स्नेह भी प्राप्त करने का मौका मिला है. महेश बताते हैं कि वह वाजपेयी जी को बापजी कहा करते थे. न जाने कितने संस्मरण उनके पास है. एक किस्सा याद करते हुए महेश बताते हैं कि 1985 में जब ग्वालियर से वाजपेयी चुनाव हार गए थे तब दिल्ली एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए कोई कार्यकर्ता नहीं था. पिताजी का फोन आया था तो मैं उन्हें अपनी पुरानी फिएट गाड़ी से रिसीव करने एयरपोर्ट पहुंचा. बाहर आए, तो कुछ पत्रकारों ने उन्हें घेर लिया और कहा कि आप तो बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे वाजपेयी जी, फिर पार्टी की हालत कैसे हो गई.

तब वाजपेयी ने बड़े मुस्कुराते हुए उनको कहा था कि देखिए राजीव गांधी जितना ऊपर उठ सकते थे उठ गए. हम जितना नीचे गिर सकते थे गिर गए. अब हमारी बारी है ऊपर उठने की और यू कहते हुए वह गाड़ी में बैठे और बोले महेश बंगाली मार्केट ले चलो गोलगप्पे खाएंगे. वाजपेयी जी ही भारतीय राजनीति में उन नेताओं में से एक थे जिन्हें अपनी हार भी सेलिब्रेट करनी आती थी. उसके बाद हम बंगाली मार्केट में जाकर हमने गोलगप्पे खाए उन्हें चाट खाने का भी बड़ा शौक था.

जब दंगाइयों के सामने खड़े हो गए थे वाजपेयी
वाजपेयी जी के बारे में महेश बताते हैं बेहद भावुक इंसान थे जिंदगी में कभी एक चींटी को भी नहीं मारा. उनका एक खरगोश जो उनको बहुत प्रिय था उसकी मौत हो गई. 2 दिन तक वाजपेयी जी ने खाना नहीं खाया लेकिन जब 1984 में जरूरत पड़ी तो पूरी भीड़ के सामने अकेले खड़े होने का साहस भी उन्हीं में था. दरअसल 1984 में दिल्ली में जो दंगे हो रहे थे सिखों को मारा जा रहा था तब वाजपेयी अपने घर के बाहर भीड़ को रोकने के लिए निहत्थे उनके सामने चले गए और उन को ललकारा. लोग वाजपेयी जी को पहचान कर वहां से वहां से निकल गए.

वाजपेयी का 300 रुपए का चेक हो रहा था बाउंस
महेश वाजपेयी जी के साथ का एक और किस्सा बताते हैं शुरूआती दिनों की बात हैं कि एक बार जिस बैंक में वाजपेयी जी का खाता था उनकी बैंक मैनेजर उनकी दोस्ती थी. एक दिन बैंक मैनेजर का फोन आया कि आपके बॉस का चेक बाउंस हो रहा है पैसे जमा कराइए. बैंक में गया देखा 300 रूपये का चेक था. पैसे जमा कराए आकर पूछा कि बापजी आप ने 300 का चेक किसको दिया था तो बोले वह टेलर को पेमेंट किया था तो आपने पैसे जमा नहीं करवाए तू है ना मेरा ध्यान रखने के लिए ऐसी शख्सियत थे.

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